Friday, 25 February 2011

क्या इत्तेफ़ाक है.....

हमें  तन्हाई मिली पर उन्हें भी महफ़िल नसीब ना हुई...क्या इत्तेफ़ाक है.....
हमने उन्हें ढूँढा ख़्वाबों में मगर ना मिले वो ज़िन्दगी तनहा हुई... क्या इत्तेफ़ाक है.....
कभी हम उन्हें भूलना चाहते थे आज उनकी ज़रुरत महसूस हुई...क्या इत्तेफ़ाक है.....
वो हमें चाहते थे जान से ज्यादा मगर अब उनकी जान पराई हुई...क्या इत्तेफ़ाक है.....
वो कहते हैं  हमें अपना जान-ए-जिगर पर हमारी न सुनाई हुई...क्या इत्तेफ़ाक है.....
इस दुनिया में बहुत शान थी हमारी पर आज जग हसाई हुई...क्या इत्तेफ़ाक है.....
हमारी दिल्लगी का आलम ना पूछो आज महफ़िल में बहुत रुसवाई हुई...क्या इत्तेफ़ाक है.....
जिसकी खातिर खुदा से की बगावत आज उनसे ही मेरी लड़ाई हुई...क्या इत्तेफ़ाक  है.....

_________________प्रमोद सोरौत.....

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