Sunday, 27 March 2011

                     अरसे  बाद आज वो फिर दिखे 

अरसे बाद आज वो दिखे ,फिर ओझल हो गए...
बहुत करीब आए वो,लेकिन फासले दरमियां हो गए...

एक झलक दिखा वो सूरत अपनी,चले गए...
पीछे छोड़ गए वो अपनी यादो के बादल घने...

एक बार तो ऐसा लगा जैसे भ्रम है कोई...
कुछ यूँ महसूस हुआ जैसे अभी तक ये अँखियाँ है सोई...

जब पहली नज़र देखा ,विश्वास न हुआ आँखों पर...
टकटकी लगाईं तो मालूम हुआ ये वही बहार है शाकों पर...

दिल डरपोक उनके करीब जाने से कतराता रहा...
अरमानो का क़त्ल हुआ दिल में,मन घबराता रहा...

उनके करीब न जाना भी एक मजबूरी थी...
कहीं जान कर भी अनजान कह दे वो,इसलिए ये दूरी थी...

एक दफ़ा तो नैन उनके भी चार हो गए...
हमें लगा कि उन्हें हमारे दीदार हो गए...

लेकिन जब मुंह उन्होंने फेर लिया...
अजीब सी उदासी ने हमें घेर लिया...

उन लम्हों में एक अजीब सा इत्तेफाक था...
मूक रह गया मैं,कुछ देर पहले बेबाक सा था...

एक लम्हा ऐसा भी था जब मैं उनकी हर बात मैं था...
हर मुस्कराहट,हर अदा,हर शोखी,हर खयालात में था...

आज ना जाने क्यों वो इतने मग़रूर हुए...
देख कर भी अनदेखा किया,मीलो हमसे दूर हुए...

ये निगाहें भीड़ में उनका पीछा करती रही...
महरूम रहा उनके दर्शन से,पल-पल ये साँसे मरती रही...

जब वो चले छोड़ कर तनहा,सोचा,शायद हमारा प्यार ही कम था...
ना कोई उम्मीद थी,न रौशनी,बस था तो एक चेहरा जो अश्कों से नम था...

उनसे आज मुलाक़ात हो जाती तो हमें कोई ग़म न होता...
हमारी अर्जी सुन लेते वो तो दर्ज़ा उनका खुदा से कम न होता...

हज़ारों शिकवे थे,अथाह गिले,सैंकड़ो शिकायतें थी...
उनका दरबार काश सजा होता,शायद हमारे लिए रियायतें थी...

सभी दर्द,किस्से अनकहे से, दफन हो गए सीने में...
पल पल ज़िन्दगी से शिकवा है,अब क्या रखा है जीने में...

इतना ग़ुरूर तो शायद चाँद को भी न होगा अपने हुस्न पर...
एक वो है जो मग़रूर बन बैठे_______________प्रमोद सोरौत.....

Friday, 25 March 2011

                  बदमाश नज़रें

नज़रें बेपरवाह इस कदर हुई...
कोई सरहद न उन पर रही...

तकती रही लगातार वो एक ही हुस्न...
हुस्न की तस्वीर में रंग भरती कभी,कभी खुद रंगीन हुई...

उन्हें झूठ लगा मेरा प्यार...
ज़माने ने देखा जब लेकिन नजरो को बहते...
उन्होंने भी महसूस किया अश्को से स्याही नमकीन हुई...

वो पहेलियाँ जो आज तक उन्सुल्झी थी...
ये नज़रें न करती कोशिश तो गुत्थी रह जाती...
मगर जब फैसले का दौर आया...
कटघरे में खुद नज़रे ही सवालों में उलझी थी...

वो बेसुध थी,बेहोश थी,कुछ न कहने की हालत में थी...
फिर भी कोतवाल (मन) उन्हें घसीटता रहा...
सज़ा  मिली उन्हें , मगर कहा वो सज़ा पाने लायक थी...

उनमें हज़ारो सपने निशब्द विचरण करते आए नज़र...
कभी भटकते थे आशियाने को...
लेकिन जब खुली रही आँखें,बेआसरा होकर गए सपने वहा से गुज़र...

वेदनाओं की दस्तक दिल में होने से अश्कों ने उनका चेहरा सबसे पहले दिखा...
कुछ अनकही सी बातें थी जिन्होंने दिल पे फ़साना दर्द-ए-दिल का लिखा...

जब बरसी ये नज़रें एक सैलाब आ गया...
न मालूम कितने ही सपने डूबे इसमें और कितने अरमानो को बहा गया...

शर्म-ओ-हया को गहना समझा हमने नज़रों का...
नासमझों ने खता समझा उठना नज़रों का...

ना ये नैन बदमाशी करते न हम बेशर्मो की फेहरिस्त में शुमार होते.....
__________________________प्रमोद सोरौत.....