Monday, 25 April 2011

वो चले गए

जिनकी उंगली पकड़कर चलना सीखा था मैंने कल...
वो अक्सर देखते होंगे आसमान से मेरा हर पल...
उनकी हर याद है आज भी इस सीने में...
वो जिंदा नहीं मगर उनका एहसास है मेरे जीने में...

उनकी,बस यादें रह गयी हैं इस चिलमन में...
किधर ढूँढू उन्हें मैं,रहता हु इस उलझन में...

उनकी खुशबू को हर हवा के झोंके में महसूस करता हूँ...
ये झोंका गुज़र ना जाए,बंद कर दरवाज़ा खुशबुओं को महफूज़ रखता हूँ...

हर आलम,हर मंज़र,हर महफ़िल में उनकी कमी सी है...
जाने क्यों राह देखती आँखों में सहर से नमी सी है...

निगाहों को इंतज़ार रहता है हर पल उनके आने का...
कहते है लोग जाने वाले नहीं आते,क्या करे ज़माने का...

सुनता रहता हूँ कि उम्मीद पर दुनिया कायम रहती है...
लेकिन अब तो उम्मीद भी दम तोडती नज़र आती है,आँखें बहती रहती है...

जब वो थे,जीवें में उत्साह था...
हर तरफ झरनों कि गूँज थी,ख़ुशी का प्रवाह था...
आज वो नहीं है,ख़ुशी का प्रवाह टूट गया...
जैसे कोई लुटेरा बसने से पहले हमें लूट गया...

जब वो दुनिया छोड़कर चले,एक आंसू लुढ़ककर आँखों से बह गया...
दुख का पहाड़ तो इस दिल पर भी टूटा था,पर जज्बातों को थामकर मैं सब सह गया...

जब जनाज़ा उठा उनका,सब्र का बाँध टूट गया...
आंसुओं का सैलाब जो दफ़न था,फूट गया...

उस रोज़ इतने आंसू गिरे कि धरती का कलेजा भी नाम हो गया...
एक शख्स जो कुछ लम्हों पहले हमारे साथ था,आज दुनिया से कम हो गया...

आसमा भी खूब गरजा,बादल भी उस रोज़ खूब रोए...
एक वो दिन था,एक ये दिन है हम पूरी नींद भर न सोए...

सुना है तारे बन जाते हैं लोग,जग से जाने के बाद...
अक्सर रातों को देखता हूँ आसमान चाहत-ए-दीदार में___________________________________________प्रमोद सोरौत.
                 काश वो मेरे होते
एक आरज़ू है उनके दिल में घर करने की...
उनकी बाहों में जीने की,उनके आघोष में मरने की...

रह-रह कर दिल आहें भरता है उनके नाम की...
जब वो ही ग़ौर न फरमाएं तो वफ़ा किस काम की...

चाहत तो हमारी भी है की हम इज़हार करें...
डरते है मगर कहीं ऐसा न हो की इनकार वो करें...

जितनी चिंता करता हूँ मैं उनके सुख की...
उतनी ही सिलवटें आ जाती है माथे पर दुःख की...

उनके लफ़्ज़ों की गूँज आ जाती है घूम-फिरकर फिर से कानों में...
बदल गए हैं वो,भूल गए है वो,लेकिन न बदले उनके लफ्ज़ इतने सालों में...

इतनी तड़प मिली है हमें तन्हाई से...
सहम जाते हैं अपनी परछाई से...

वो मेहरबान हो जाते तो हम भी ज़िन्दगी जी लेते...
उनकी खातिर हद से गुज़रना क्या,हम तो ज़हर पी लेते...

जब उन्होंने ठुकरा कर हमें पराया कर दिया...
हमने ओढ़ कर हया की चादर, उन्हें हमसाया कर दिया...

सुलगती आंच पर तो सब हाथ सेकते हैं...
मरने के बाद जनाज़े पर फूल फेंकते हैं...

अश्कों की स्याही की कालिख से अब तो मुखड़ा स्याह रहने लगा है...
कही काला करवा के आया है मुँह,अब ये ज़माना कहने लगा है...

अब तो सजदे में भी झुकने की हिम्मत नहीं होती...
डर है,कहीं खुदा पूछ बैठा काले मुँह से झुकने में ज़िल्लत नहीं होती...

उनको देखा करता था अक्सर शब् में डूबता सूरज देखते...
दिल चाहता है मैं भी किसी शाम का मंज़र होता...
मैं भी किसी शाम का मंज़र होता...
उनके दिल में न सही उनकी नज़र में रहता____________________________प्रमोद सोरौत.