Friday, 25 March 2011

                  बदमाश नज़रें

नज़रें बेपरवाह इस कदर हुई...
कोई सरहद न उन पर रही...

तकती रही लगातार वो एक ही हुस्न...
हुस्न की तस्वीर में रंग भरती कभी,कभी खुद रंगीन हुई...

उन्हें झूठ लगा मेरा प्यार...
ज़माने ने देखा जब लेकिन नजरो को बहते...
उन्होंने भी महसूस किया अश्को से स्याही नमकीन हुई...

वो पहेलियाँ जो आज तक उन्सुल्झी थी...
ये नज़रें न करती कोशिश तो गुत्थी रह जाती...
मगर जब फैसले का दौर आया...
कटघरे में खुद नज़रे ही सवालों में उलझी थी...

वो बेसुध थी,बेहोश थी,कुछ न कहने की हालत में थी...
फिर भी कोतवाल (मन) उन्हें घसीटता रहा...
सज़ा  मिली उन्हें , मगर कहा वो सज़ा पाने लायक थी...

उनमें हज़ारो सपने निशब्द विचरण करते आए नज़र...
कभी भटकते थे आशियाने को...
लेकिन जब खुली रही आँखें,बेआसरा होकर गए सपने वहा से गुज़र...

वेदनाओं की दस्तक दिल में होने से अश्कों ने उनका चेहरा सबसे पहले दिखा...
कुछ अनकही सी बातें थी जिन्होंने दिल पे फ़साना दर्द-ए-दिल का लिखा...

जब बरसी ये नज़रें एक सैलाब आ गया...
न मालूम कितने ही सपने डूबे इसमें और कितने अरमानो को बहा गया...

शर्म-ओ-हया को गहना समझा हमने नज़रों का...
नासमझों ने खता समझा उठना नज़रों का...

ना ये नैन बदमाशी करते न हम बेशर्मो की फेहरिस्त में शुमार होते.....
__________________________प्रमोद सोरौत.....


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