काश वो मेरे होते
एक आरज़ू है उनके दिल में घर करने की...
उनकी बाहों में जीने की,उनके आघोष में मरने की...
रह-रह कर दिल आहें भरता है उनके नाम की...
जब वो ही ग़ौर न फरमाएं तो वफ़ा किस काम की...
चाहत तो हमारी भी है की हम इज़हार करें...
डरते है मगर कहीं ऐसा न हो की इनकार वो करें...
जितनी चिंता करता हूँ मैं उनके सुख की...
उतनी ही सिलवटें आ जाती है माथे पर दुःख की...
उनके लफ़्ज़ों की गूँज आ जाती है घूम-फिरकर फिर से कानों में...
बदल गए हैं वो,भूल गए है वो,लेकिन न बदले उनके लफ्ज़ इतने सालों में...
इतनी तड़प मिली है हमें तन्हाई से...
सहम जाते हैं अपनी परछाई से...
वो मेहरबान हो जाते तो हम भी ज़िन्दगी जी लेते...
उनकी खातिर हद से गुज़रना क्या,हम तो ज़हर पी लेते...
जब उन्होंने ठुकरा कर हमें पराया कर दिया...
हमने ओढ़ कर हया की चादर, उन्हें हमसाया कर दिया...
सुलगती आंच पर तो सब हाथ सेकते हैं...
मरने के बाद जनाज़े पर फूल फेंकते हैं...
अश्कों की स्याही की कालिख से अब तो मुखड़ा स्याह रहने लगा है...
कही काला करवा के आया है मुँह,अब ये ज़माना कहने लगा है...
अब तो सजदे में भी झुकने की हिम्मत नहीं होती...
डर है,कहीं खुदा पूछ बैठा काले मुँह से झुकने में ज़िल्लत नहीं होती...
उनको देखा करता था अक्सर शब् में डूबता सूरज देखते...
दिल चाहता है मैं भी किसी शाम का मंज़र होता...
मैं भी किसी शाम का मंज़र होता...
उनके दिल में न सही उनकी नज़र में रहता____________________________प्रमोद सोरौत.

No comments:
Post a Comment